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तुम्‍हारी स्‍पैरो, हमारी मुनिया

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बित्‍ता भर कोने की दरकार
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पिछले दिनों मेंरे सात वर्षीय बेटे सक्षम ने जिद़द किया कि मुझे पिकाक चाहिए। वह इसे अपनी किताब में देख कर इस जिद़द पर उतर गया। मैं बाजार गया, लेकिन खिलौनो की दुकान पर पिकाक नहीं मिला। घर में उसकी जिद़द जारी थी, सो श्रीमती जी ने मेरे सेल को बजा दिया और अपना सेल उसे थमा दिया। उधर से वह पिकाक की जिद़द करने लगा और मैं उसे समझाने लगा ही था कि दुकानदार ने एक गौरया दिखाते हुए कहा कि, क्‍या यह चलेगा । उम्‍मीद जगी तो मैने बेटे से पूछा स्‍पैरो लोगे। इस पर उसने हामी भर दी। मेरा संकट टल गया। घोसला सहित युगल गौरया ले जा कर जब उसकों दिया तो वह पूछ पडा, किताब में तो एक ही रहती है इसमें एक साथ दो क्‍यों है। मैने उससे कहा एक साथ कई भी रहती है। वह पूछ पडा, कहां। मै मौन साध लिया। कारण स्‍पष्‍ट था। शहर में बनी मकान में गौरैया आती नहीं है और गांव की मकान में कभी मेरा बेटा गया ही नहीं। शायद वहां आता-जाता तो उसको पता चलता कि जो गौरया उसके लिए किताबी हो गयी है वहीं गौरया हमारे समय में घर के कोने-कोने में फुदकती चहकती रहती थी। उसे हम मुनिया पुकारते थे। घायल होती थी तो हम दुखी होते थे। उस पर मरहम लगाते थे। जब वह बाहर चली जाती थी तो उसके बच्‍चों को घोसला से लिकालते और जब उसके आने का समय होता तो उसे सुरक्षित घोसला में पहुंचाते थे। उसके साथ खेलते थेत्। वह परिवार के सदस्‍य की तरह रहती थी। दादी उसके लिए घर के बाहर धान व गेहूं की बालियां इक्‍ट़ठा बांध कर लटकाती थी। इसे चुंगने के साथ बाहर फैलाए गये आनाज पर वह चोच मारती थी तो भी कोई उसको भगाता नहीं था। दादा की थाली में तो बकायदा उसका अपना हिस्‍सा था। दोपहर में जब भी वह खाने पर बैठते थे तो पहली रोटी बारीक टुकडों में तोड कर थाली के सामने उसके लिए बिखेरते और मुनिया अपने साथियों सहित उसे चुंगती रहती। दादा का शायद ही किसी दिन का दोपहर का भोजन मुनिया के बगैर हुआ हो। मुनिया को भी उनके खाने का समय मालूम होता था और वह उस समय पर कहीं नहीं जाती। उसके प्रति परिवार का यह प्रेम ही था कि वह बाहर जाती और तिनका बटोर कर घर के कोनो व छत लगी लकडियों के बीच घोसला बनाती। इस घोसले को हम उतना सहजेते थे जिनका की अपनी पुस्‍तक। तब कोई पूछता गौरैया देखे हो तो हम तपाक से कहते हां। पूछता कहा तो जबाब होता अपने घर में। अब घर तो है पर मुनिया नहीं है। बेटा उसे किताबों में देखता है और हम सब उसे खिलौने के शक्‍ल में दिखाते हैं। सच में अपीनी पीढियों से अपनी मुनिया को दूर करने के दोषी भी हमी है। हमने कच्‍चे मकान को पक्‍का किया तो मुनिया का कोना नहीं छोडा। बचपन में तो उसके घोसले को बचाते रहे पर बडे होने पर बडी मकान के चक्‍कर में उसे उजाड दिये। दादी चली गयी तो घर के बाहर धान और गेहूं की बालियों को बांधने की परम्‍परा भी खत्‍म हो गयी। दादा नहीं हैं तो उस थाली में उसका हिस्‍सा भी नहीं है। टोटी लगने से वह पानी भी नहीं रहा जो नल की नीचे लगा रहता था और मुनिया न केवल उसे पीती थी बल्कि उसी में स्‍नान भी करती थी। उसी के फुदकने एवं चहकने तथा नाहने से हमारे जीवन में फुदकना, चहकना और चिरईया नहान जैसे शब्‍द आए। पर, अब वह नहीं आती। आए भी कैसे, हमने उसके लिए घर में एक कोना तक नहीं छोडा है, जहां वह अपनी मेहनत से तिनका तिनका जोडकर अपना घोसला बना सके। शहर में तो उसकी नो इन्‍ट्री हो गयी है। गांव में भी अस्‍सी फसीदी घरों में उसके लिए जगह नहीं बची है। पक्‍के हो चुके ये घर कभी कच्‍चे थे तो वह इनमें अपनी जगह तालश लेती थी। जगह के अभाव में अब वह यहां नहीं आती। उसके आने जाने के रास्‍ते में हमारे मोबाइल टावर की तरंगे और सीसा रहति पेटोल से निकलने वाले गैस ब्रेकर बन गये हैं। नर और मादा मुश्किल से इस बांधा को पार कर पाते हैं। ऐसे में उनकी संख्‍या नब्‍बे फीसदी तक घट गयी है। इसे बढाने के लिए बीस मार्च को विश्‍व ने उसके नाम करते हुए विश्‍व गौरैया दिवस घोषित किया है। देर से ही सही मुनिया को बचाने की मुहिम शुरू हो गयी है। मेरी आप सब से यही गुजारीश है कि दाना पानी न सही अपने घर में बित्‍ता भर का एक कोना ही उसके लिए छोड दें। वह अपना घोषला तैयार कर लेगी। तब हम और आप अपनी पीढियों को बता सकेंगे, वह जो सामने फुदक फुदक नहा रही है वहीं है तुम्‍हारी स्‍पैरो और हमारी मुनिया।

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337 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kaydence के द्वारा
July 20, 2016

Cu toate ca eu postez pozele nici Nana nu vrea sa se vada pe blog. Dar idei de texte are si mi le da, pozele sunt toate facute de ea, dar… In 2010, acum un an, a facut un comentariu. Poate în 2011 o sa si scrie, ca are de unde scrie si un roman. Despre râs în general, si despre râsul în Franta, în particular, e de vorbit mu80L#l23t;&a Multi Ani si toata caldura pe care v-o doriti si ne-o dorim toti!!

डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
April 23, 2012

भई वाह , ज्ञानेन्‍द्र  जी , जवाब नहीं आपकी शैली का । घर के आंगन में फुदकती गौरेया , मुंडेर पर बैठे कौवे , सुबह-सुबह गूंजती कोयल की कूक………,सब कुछ सपना हो गया है । अब न तो घर में आंगन है और न ही बरामदे में  कडियों की छत । कंकरीट के जंगल में  हम एक मशीनी जिंदगी जी रहे हैं। भावपूर्ण ब्‍लाग ……बहुत बहुत बधाई।

    April 23, 2012

    शुक्रिया मनोज जी, उम्‍मीद थी आप ब्‍लाक पर सक्रिय होंगे और मेरा उत्‍साह बढाऐंगे

sanjeev singh के द्वारा
April 22, 2012

nice

vishleshak के द्वारा
April 21, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी,बहुत सारे लोगों के दर्द को आपने शब्द दिए है,इसके लिए आपको साधुवाद ।ऐसे ही प्रयासों से हम न केवल गौरेया जैसे पक्षियों को बचा सकते है,बल्कि अपनी पुरानी संस्कृति को भी बचा सकते है ।विश्लेषक&याहू .इन ।

    April 21, 2012

    इस अभियान को और आगे बढाने की जरूरत है और आप की प्रतिक्रिया से बल मिला है, धन्‍यवाद

Tamanna के द्वारा
April 20, 2012

ज्ञानेंद्र जी.. एक छोटी सी घटना के माध्यम से आपने वाकई बहुत बड़ी चिंता पर चोट की है. जिस कंक्रीट जंगल में हम रह रहे हैं वहां प्रकृति के अनमोल और खूबसूरतरचनाएं हम से छीन ली हैं.

    April 20, 2012

    तमन्‍ना जी, यह तो मानव स्‍वभाव है, जब अभाव अपनी जद में लेता है तो मन चिंता को अपनाता है। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद, लेकिन इस उम्‍मीद के साथ कि इसके साथ सुझाव भी आएंगे।

Jack के द्वारा
April 20, 2012

क्षमा चाहूंगा मैंने अपने कमेंट में कहानी की जगह कविता लिख दिया

Jack के द्वारा
April 20, 2012

महोदय यकीन मानिएं आपकी यह कविता पढ़्कर दिल प्रसन्न हो उठा है., बहुत ही मजेदार कविता है यह आपकी बेहद मनोरंजक

    April 20, 2012

    प्रक्रिया के लिए धन्‍यवाद

    Bubbie के द्वारा
    July 20, 2016

    Das sieht aber mal wieder lecker aus….. Du hast immer so schöne Fotos da werde ich ganz neidisch. Hast du das mal gelt?nt?r?Besee grüßeAlice

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 20, 2012

त्रिपाठी जी नमस्कार, बहुत शानदार शमां बांधा है. शानदार प्रस्तुति. मैंने भी जब यह जाना कि गौरैया एक विलुप्त पक्षियों की श्रेणी में आ गयी है तो मैं हतप्रभ हो गया. क्योंकि मैं तो गौरैयों को अक्सर अपने घर में देखा करता हूँ. मेरे घर में उनके घोसले बने हुए हैं. हाँ दो – तीन साल से यह जरुर महसूस हुआ कि उनकी जनसँख्या काफी कम हुयी है. मैं सोचा करता था शायद वह हमारे घर को छोड़ कर कहीं अन्यत्र चली गयीं हैं. अभी जो बची हैं वे या तो अपने अंडे गिरा दे रहीं हैं या फिर उनके बच्चे ही मर जा रहे हैं. उनको बचाने के लिए क्या प्रयास किया जाय यदि संभव हो तो मार्ग-दर्शन कीजिये.

    April 20, 2012

    कुल सुबह स्‍परौ पर आप से बात होगी, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद, जरूरत पडी तो एक पोस्‍ट मुनिया के जीवन के नाम भी

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 20, 2012

नमस्कार ज्ञानेंद्र जी क्या खूब कही… …जानकर बहुत ही अफसोस हुआ जो गोरैया घर -२ में चचहाती फिरती थी वो अब विलुप्त होने के कगार पर है ..बात यंहा तक पहुच गयी ..आने वाली पीढ़ी उससे अनजान है , किताबो में उसे सिर्फ देख रही है और गोरैया दिवस मानाने और बचाने का प्रयास की जरुरत पड़ गयी …बेहद सोचनीय और चिंतनीय बात है ….. बात सिर्फ गोरैया के साथ पर्यावरण प्रदुषण और प्रकृति से निकटता का समाप्त होना भी भी बेहद गंभीर विषय है…बरहाल आपने बहुत ही मनोरंजक और संवेदनशीलता के साथ …आपने बात रखी आपका बहुत धन्यवाद और बधाई

चन्दन राय के द्वारा
April 20, 2012

ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी साहब , आपके ह्रदय में नभचर गौरैया के लिए यह प्रेम भाव देखकर ह्रदय गद गद हो गया आपने बड़े ही मनोहारी घटनाओं के दृश्य से मनो समां बांध दिया , आपकी कलम और लेखनी को मेरा नमन

    April 20, 2012

    चंदन जी, यह जरूरी प्रेम और तब बढ जाता है जब आप जैसे साथी अपनी प्रतिक्रया में कंजूसी नहीं करते हैं, धन्‍यवाद


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